जब कभी मैं कह न पाऊँ...और अगर तुम सुन सको...
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Friday, September 30, 2016
Tuesday, April 16, 2013
प्रिय ना आना अब सपनों में
प्रिय ना आना अब सपनों में।
स्मृति को आलिंगन कर मुझको
रहने दो बस अब अपनों में,
प्रिय ना आना अब सपनों में।
कितने पल उलझे हैं अब भी
यादों के उस इंद्रधनुष में,
जिसको हमने साथ गढ़ा था,
रंग भरे थे रिक्त क्षणों में
धागा-धागा आशाओं से
सपने काते इन नयनों में
रुमझुम गीतों के नूपुर में
जड़ दी थीं कुछ गुनगुन बातें,
खनक उठे थे हँसते लम्हें
आँसू से सीली वे रातें,
मादक सी उन शामों को अब
बह ही जाने दो झरनों में।
अबके हम जब लिखने बैठें
झूठ मूठ की एक कहानी
तुम रख लेना बाँध सम्हाले
मेरी आँखों बहता पानी
यादो के सिरहाने उनको
मोती कर रखना गहनों में
प्रिय ना आना अब सपनों में
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