Tuesday, September 29, 2015
Tuesday, April 23, 2013
कुछ इक फ़ासले मैं मिटाता नहीं हूँ
Thursday, March 01, 2012
Sunday, January 23, 2011
गज़ल-ज़िंदगी रोज़ आज़माती है
कोई खुश्बू कहीं से आती है
मेरे घर की ज़मीं बुलाती है
ज़िंदगी इक पुरानी आदत है
यूँ तो आदत भी छूट जाती है
जाने क्या-क्या सहा किया हमने
पत्थरों पर शिकन कब आती है
आप होते हैं पर नहीं होते
रात यूँ ही गुज़रती जाती है
तज्रिबा है हरेक पल ऐ दोस्त
ज़िंदगी रोज़ आज़माती है
Sunday, June 13, 2010
उस मोड़ से शुरु करें ये ज़िंदगी- जगजीत सिंह
आइये सुनें ये सुंदर गज़ल, जगजीत की आवाज़ में।
Sunday, March 21, 2010
ग़ज़ल- दिल में ऐसे उतर गया कोई
आँख में बस गई है परछाईं
दिल में ऐसे उतर गया कोई
एक आलम को छोड़ कर हैरां
ख़ामुशी से गुज़र गया कोई
हो के बर्बाद उधर से लौटा था
जाने क्यों फिर उधर गया कोई
"दोस्त" कैसे बदल गया देखो
मोजज़ा ये भी कर गया कोई
Thursday, March 11, 2010
मिताली (मुखर्जी) सिंह- दो गज़लें
उन दिनों ख़ूब ग़ज़लें सुनती थी, ख़ाली वक़्त में। जगजीत सिंह की ग़ज़लें सबसे प्रिय थीं। मेरी उम्र रही होगी सोलह-सत्रह साल की। इसी तरह मिताली मुखर्जी (मिताली सिंह) की गायी एक दो गज़लों ने दिल में ऐसी जगह बनाई थी, कि अब भी उन ग़ज़लों को सुन कर वे दिन याद आ जाते हैं। उनकी आवाज़ की दीवानी थी मैं। आज उनकी दो गज़लें सुन रही थी। वे दिन भी कितने हसीन थे। :-)
अहमद फ़राज़ की ये गज़ल उनकी आवाज़ में-
कुछ प्यार जहां में ऐसे हैं
अश्कों में जो पलते देखे हैं
दुश्मन तो न बदले अपने कभी
हमदम ही बदलते देखे हैं
कुछ न किसी से बोलेंगे
तन्हाई में रो लेंगे
हम बेरहबरों का क्या
साथ किसी के हो लेंगे
ख़ुद तो हुए रुसवा लेकिन
तेरे भेद न खोलेंगे
नींद तो क्या आयेगी "फ़राज़"
मौत आई तो सो लेंगे
मिताली जी की ही गाई हुई एक और ग़ज़ल। शायरी तो ख़ास नहीं पर इस ग़ज़ल की कम्पोज़िशन में जादू था। जाने कितने हज़ार बार सुना होगा उसे तब-
मुझे माफ़ कर मेरे हमसफ़र तुझे चाहना मेरी भूल थी
किसी राह पर यूँ ही इक नज़र तुझे देखना मेरी भूल थी
तुझे देख के किसी हाल में, वो उलझना ज़ुल्फ़ों के जाल में
सुबहो-शाम तेरे ख़याल में, मेरा डूबना मेरी भूल थी
तुझे ढूँढती है मेरी नज़र न है रास्ता न कोई डगर
वो गली गली वो नगर नगर तुझे ढूँढना मेरी भूल थी
मेरे ख़्वाब भी हैं अजीब से, तुझे देख लूँ मैं क़रीब से
मुझे तू मिला है नसीब से, यही सोचना मेरी भूल थी।
Monday, March 01, 2010
ग़ज़ल- तेरा क्या और मेरा क्या है
दर्द का आख़िर क़िस्सा क्या है
हर इक बात में ज़िक्रे-यार अब
तर्के-तआल्लुक़ है, या क्या है
(तर्के-तआल्लुक़- टूटा रिश्ता)
उम्र तआर्रुफ़ में गुज़री, अब
खु़द से मिल कर रोता क्या है
(तआरुफ़- पहचान होना)
एक नशेमन तिनका तिनका
तेरा क्या है मेरा क्या है
(नशेमन- आशियाना)
’दोस्त’ हैं राहें अपनी अपनी
झूठा क्या और सच्चा क्या है
Saturday, November 07, 2009
मेरे घर में उस बुढ़ापे के लिये कमरा नहीं
ग़ज़ल एक बार फिर -
जिसको अपना मान कर रोएँ कोई पहलू नहीं
मेरे घर में उस बुढ़ापे के लिए कमरा नहीं
आदमी को आदमी से जब भी लड़ना था कभी
उस के जाने पर भला रोएँ कभी क्यों जो मुझे
कौन आकर ख़्वाब में आँखों में पानी दे गया
Sunday, October 25, 2009
ग़ज़ल- छोटी-छोटी सी ख़ुशियाँ हैं
नई मिट्टी है मन सोंधा है
कटती-जुड़ती सी कड़ियाँ हैं
तेरा प्यार से गाल चिकुटना
छोटी-छोटी सी खुशियाँ हैं
बचपन के सपनों से अब तक
अम्मा की जगती अँखियाँ हैं
झकमक धूप जो आंगन खेले
थोड़े दिन की रंगरलियाँ हैं
रातों को तेरी यादों से
लुकछुप मिलती दो सखियाँ हैं
अब के इस मौसम में नन्हें
फूलों से महकी गलियाँ हैं
Tuesday, October 20, 2009
ग़ज़ल-मिलते ही मैं गले नहीं लगता
मैं जो अच्छा हुआ जनाब तो क्या
कुछ नहीं मुश्त-ए-ख़ाक से बढ़ कर
आदमी का है ये रुआब तो क्या
उम्र गुज़री उन आँखों को पढ़ते
इक पहेली है वो किताब तो क्या
मैं हूँ जुगनू अगर तो क्या कम हूँ
और कोई हैआफ़ताब तो क्या
ज़िंदगी ही लुटा दी जिस के लिये
आज माँगे वही हिसाब तो क्या
मिलते ही मैं गले नहीं लगता
फिर किसी को लगे ख़राब तो क्या
हम फ़ना हो गए मुहब्बत में
’दोस्त’ मरकर मिला सवाब तो क्या
(फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन)
(२१२२ १२१२ २२)
Tuesday, September 01, 2009
ग़ज़ल- है फ़ासले तो बहुत पर मिली हैं राहें कहीं तो

दबी हुई है कहानी, हैं दफ़्न लाशें कहीं तो
मैं जो ज़मीं पे हूँ ज़र्रा, है आसमां उसकी मंज़िल
हैं फ़ासले तो बहुत पर, मिली हैं राहें कहीं तो
किया करूँ मैं दिनो-रात उसकी बातें सभी से
मेरी भी यादों से महके किसी की रातें कहीं तो
मैं हँस रहा हूँ हमेशा कमी नहीं है किसी की
कोई बताता तो होगा उसे ये बातें कहीं तो
बढ़ा के ग़म ढूँढते हैं कहाँ-कहाँ ’दोस्त’ अब हम
चलो उतारे ये सामां, किसी से बाँटें कहीं तो
( इस गज़ल को लिखते वक़्त ६ शेर बने। एक जो शेर और बना वो कुछ यूँ है)-
दिखा रहा था वोजैसे मुझे नहीं जानता है
उसे नहीं याद कोई सुनी हों बातें कहीं तो
(मफ़ाइलुन फ़ाइलातुन ) x 2
Tuesday, June 16, 2009
जो सब कुछ पाने बैठे हैं- ग़ज़ल

वो जो अदना से बैठे हैं
हमको अब जब होश नहीं वो
हद की बातें ले बैठे हैं
ख़ुद का इल्म नहीं है उनको
पर सब को जाने बैठे हैं
कुछ ऐसे हैं, चैन से उकता
के जो ग़म पाले बैठे हैं
जाने क्या कुछ खो दें अब वो
जो सब कुछ पाने बैठे हैं
भीगी इन पलकों पे जाने
कितने अफ़साने बैठे हैं
'दोस्त' अब उनको क्या परखें जो
ग़ैरों में जा के बैठे हैं
Wednesday, June 10, 2009
ग़ज़ल- बड़ी ऊँची हैं दीवारें

नया ये काम कर के ही दिखा दें अब
बड़ी ऊँची है दीवारें, गिरा दें अब
उन्हें मिलने का ये फ़न भी सिखा दें अब
रुका सैलाब इन आंखों से बहा दें अब
सिहर जाओ जो ज़ख्म अपने दिखा दें अब
चलो झीना ये पर्दा भी हटा दें अब
तो 'दोस्त' अपना भी दर्द उनको सुना दें अब
Thursday, May 21, 2009
बदलाव -बस यूँ ही
बदलाव ज़िंदगी का एक तरीका है। तरीका ख़ुद-ब-ख़ुद उलझ जाने का और उलझ कर फिर खू़बसूरती से सुलझ जाने का। हर उलझाव के साथ खुलते हैं कुछ गिरह और हर सुलझाव ले आता है एक सवाल। जवाब के इंतज़ार में एक लंबे ख़ामोश पल के बाद पीछे दरवाज़ा बंद होता है। और फिर खुलता है एक नियम और हम बंध जाते हैं उस नये नियम में।
हाँ, ये भी ज़िंदगी का एक तरीका है...
जगजीत सिंह की आवाज़ का जादू...
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जीवन क्या है, चलता फिरता एक खिलौना है
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है
चलते चलते राह में यूँ ही रस्ता मुड़ जाता है
अनजाने में अनजाने से रिश्ता जुड़ जाता है
किसे पता है किस रस्ते में कब क्या होना है
बीत गया जो वो हर पल आगे क्यों चलता है
राख हुये अंगारे कब के फिर भी दिल जलता है
भूली बिसरी यादों को अश्कों से धोना है
जो जी चाहे वो मिल जाये कब ऐसा होता है
हर जीवन जीवन जीने का समझौता होता है
अब तक जो होता आया है वो ही होना है
रात अंधेरी भोर सुनहरी यही ज़माना है
हर चादर में सुख का ताना दुख का बाना है
आती सांस को पाना जाती साँस को खोना है
Thursday, May 14, 2009
उम्र बन के रह गई है - ग़ज़ल

सहरा-ए-दिल में कोई बाक़ी रही ना तश्नगी
रात के बोसे का शम्मे पर असर कुछ यूँ हुआ
उम्र भर पीती रही रो-रो के उस की तीरगी
उससे मिलके एक तुम ही बस नहीं हैरां कोई
है गली-कूचा परेशां देख ऐसी सादगी
आजकल दिखने लगा है मुझको अपना अक़्स भी
आजकल क्या आइना भी कर रहा है दिल्लगी
झुक गया हूँ जब से उसके सजदे में ऐ ’दोस्त’ मैं
उम्र बन के रह गई है बस उसी की बंदगी
Wednesday, April 29, 2009
ऊपर जहां चलता रहा- ग़ज़ल

बेसबब फिर रात भर मैं आँख क्योँ मलता रहा
Monday, April 20, 2009
महावीर जी को जन्मदिन की शुभकामनायें- उनकी दो ग़ज़लें

गुफ़तगू में फूल झड़ते थे किसी के होंठ से
जब मिले हम से कभी, इक अजनबी की ही तरह
दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था
दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
ख़्वाब में दीदार हो जाता तेरी तस्वीर का
हाथ ज़ख़्मी हो गए, इक फूल पाने के लिए
ग़म लिए दर्दे-शमां जलती रही बुझती रही
सूने दिल में गूँजती थी, मद भरी मीठी सदा
ज़िन्दगी भी छाँव में जलती रही यादें लिए
रह गया क्या देखना, बीते सुनहरे ख़्वाब को
जब मिले मुझ से मगर इक अजनबी की ही तरह
Saturday, March 21, 2009
ग़ज़ल-तेरे सिवा
कहीं नज़र तो आये कोई और भी मेरे सिवा
तु आ के मेरी ज़िंदगी में देख ले है क्या नहीं
हँसी, खुशी, चहक, महक, सभी तो है तेरे सिवा
चलो गुज़र गई जो फिर ये शाम कल की ही तरह
नया तो कुछ हुआ नहीं कभी गुज़रने के सिवा
मुझे कहाँ किसी सहारे की उम्मीद थी मगर
हज़ार हाथ आये थे, बस एक हाथ के सिवा
तू रख ज़रा सा सब्र ’दोस्त’, कर गुमां भरम पे ये
जहां में उसके और कौन है भला तेरे सिवा
(मफ़ाइलुन x 4)
बहरे रज़ज़ मुसम्मन सालिम
Wednesday, March 18, 2009
ग़ज़ल-मुझे तू आज़मा के देख तो कभी

तुझे यकीं ये हो न हो, मैं दोस्त हूँ तेरा, हाँ सच
ऐ आइना मैं अजनबी सा लगता हूँ तो क्या, हाँ सच
मैं दुश्मनी निभाउंगा तो दोस्ती ही की तरह
मुझे तू आज़मा के देख तो कभी ज़रा, हाँ सच
वो रोशनी की बात करता होगा सबके सामने
मगर उसे भी खुद है अपने दाग़ का पता, हाँ सच
मुझे भी जीतना तो आता है मगर, यूँ हार कर
गु़रूर को तेरे मैं जीतते हूँ देखता, हाँ सच
मैं मंदिरों में उससे कम ही मिलने आता जाता हूँ
वो रोज़ मेरे घर में आ के मुझसे है मिला, हाँ सच
वो जाते जाते मुझको ढेरों ग़म तो दे गया मगर
अज़ीज़ है मुझे हरेक अश्क़ जो बहा, हां सच
मैं आज सुर्खियों मे हूँ तो ’दोस्त’ बस तेरे लिये,
तुझे नहीं पता जो कर्ज़ मुझपे है तेरा, हाँ सच




