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Tuesday, April 23, 2013

कुछ इक फ़ासले मैं मिटाता नहीं हूँ


मैं खुद हाथ आगे बढ़ाता नहीं हूँ
बढ़ा लूँ कदम, तो हटाता नहीं हूँ

वो चाँद आसमां में ही चमका करे पर 
कुछ इक फ़ासले मैं मिटाता नहीं हूँ

मेरी ज़िंदगी में भी दो-चार गम हैं
ये बात और है मैं दिखाता नहीं हूँ

यूँ मैं याद रखता हूँ हरदम खुदा को
बस अपने लिये हाथ उठाता नहीं हूँ

न मांगो ऐ ’दोस्त’ अब जो बस में नहीं है
मैं क़िस्मत बदल दूँ, विधाता नहीं हूँ

--मानोशी

Thursday, March 01, 2012



आज दुनिया मना रही होली
शोर फिर से मचा रही होली

मीठी रस्में निभा रहे हैं कुछ
गालियाँ भी निभा रही होली

मैल मन का जला नहीं अब तक
कब से दुनिया जला रही होली

साल दर साल बदलते चेहरे
अक़्स कितने मिटा रही होली

डिस्को पब हो गया है कल्चर जो
फाग-होरी भुला रही होली

Sunday, January 23, 2011

गज़ल-ज़िंदगी रोज़ आज़माती है

कोई खुश्बू कहीं से आती है
मेरे घर की ज़मीं बुलाती है

ज़िंदगी इक पुरानी आदत है
यूँ तो आदत भी छूट जाती है

जाने क्या-क्या सहा किया हमने
पत्थरों पर शिकन कब आती है
 
आप होते हैं पर नहीं होते
रात यूँ ही गुज़रती जाती है

तज्रिबा है हरेक पल ऐ दोस्त
ज़िंदगी रोज़ आज़माती है 

Sunday, June 13, 2010

उस मोड़ से शुरु करें ये ज़िंदगी- जगजीत सिंह

जिस मोड़ पर ठहरे हो, वहाँ से दो रास्ते हैं, एक लौट जाता है पीछे और एक ठहर जाता है। आगे नहीं जाता।  ठहर कर पीछे मत देखो, आगे देखोगे तो भी पीछे देखना होगा।  बस ठहरे रहो। हवा उड़ा ले जायेगी तो चले जाना, हवा के साथ। पर तब भी मत देखना पीछे।  वो तुम नहीं थे, हवा थी जो गई, तुम तो अभी भी ठहरे रहोगे, वहीं।  किसी का हाथ पकड़ कर नहीं, अपना हाथ पकड़ कर रहो, वो तुम्हारे साथ था तो वहीं होगा, अपने मोड़ पर ठहरा हुआ, पीछे वो भी नहीं देखता होगा, आगे भी नहीं, बस वहीं, जहाँ है। प्रेम विश्वास है, स्थिरता, और कुछ नहीं।  

आइये सुनें ये सुंदर गज़ल, जगजीत की आवाज़ में।

Sunday, March 21, 2010

ग़ज़ल- दिल में ऐसे उतर गया कोई



दोस्त बन कर मुकर गया कोई 
दो कदम चल के डर गया कोई

आँख में बस गई है परछाईं
दिल में ऐसे उतर गया कोई


एक आलम को छोड़ कर हैरां

ख़ामुशी से गुज़र गया कोई

हो के बर्बाद उधर से लौटा था
जाने क्यों फिर उधर गया कोई

"दोस्त" कैसे बदल गया देखो
मोजज़ा ये भी कर गया कोई

Thursday, March 11, 2010

मिताली (मुखर्जी) सिंह- दो गज़लें


उन दिनों ख़ूब ग़ज़लें सुनती थी, ख़ाली वक़्त में। जगजीत सिंह की ग़ज़लें सबसे प्रिय थीं। मेरी उम्र रही होगी सोलह-सत्रह साल की।  इसी तरह मिताली मुखर्जी (मिताली सिंह) की गायी एक दो गज़लों ने दिल में ऐसी जगह बनाई थी, कि अब भी उन ग़ज़लों को सुन कर वे दिन याद आ जाते हैं। उनकी आवाज़ की दीवानी थी मैं। आज उनकी दो गज़लें सुन रही थी। वे दिन भी कितने हसीन थे। :-)

अहमद फ़राज़ की ये गज़ल उनकी आवाज़ में-



कुछ प्यार जहां में ऐसे हैं
अश्कों में जो पलते देखे हैं
दुश्मन तो न बदले अपने कभी
हमदम ही बदलते देखे हैं

कुछ न किसी से बोलेंगे
तन्हाई में रो लेंगे

हम बेरहबरों का क्या
साथ किसी के हो लेंगे

ख़ुद तो हुए रुसवा लेकिन
तेरे भेद न खोलेंगे

नींद तो क्या आयेगी "फ़राज़"
मौत आई तो सो लेंगे

मिताली जी की ही गाई हुई एक और ग़ज़ल। शायरी तो ख़ास नहीं पर इस ग़ज़ल की कम्पोज़िशन में जादू था। जाने कितने हज़ार बार सुना होगा उसे तब-



मुझे माफ़ कर मेरे हमसफ़र तुझे चाहना मेरी भूल थी
किसी राह पर यूँ ही इक नज़र तुझे देखना मेरी भूल थी

तुझे देख के किसी हाल में, वो उलझना ज़ुल्फ़ों के जाल में
सुबहो-शाम तेरे ख़याल में, मेरा डूबना मेरी भूल थी

तुझे ढूँढती है मेरी नज़र न है रास्ता न कोई डगर
वो गली गली वो नगर नगर तुझे ढूँढना मेरी भूल थी

मेरे ख़्वाब भी हैं अजीब से, तुझे देख लूँ मैं क़रीब से
मुझे तू मिला है नसीब से, यही सोचना मेरी भूल थी।

Monday, March 01, 2010

ग़ज़ल- तेरा क्या और मेरा क्या है

तेरा मेरा रिश्ता क्या है
दर्द का आख़िर क़िस्सा क्या है

हर इक बात में ज़िक्रे-यार अब
तर्के-तआल्लुक़ है, या क्या है

(तर्के-तआल्लुक़- टूटा रिश्ता)

उम्र तआर्रुफ़ में गुज़री, अब
खु़द से मिल कर रोता क्या है

(तआरुफ़- पहचान होना) 

एक नशेमन तिनका तिनका
तेरा क्या है मेरा क्या है

(नशेमन- आशियाना)
’दोस्त’ हैं राहें अपनी अपनी
 झूठा क्या और सच्चा क्या है

Saturday, November 07, 2009

मेरे घर में उस बुढ़ापे के लिये कमरा नहीं

जनसता के वार्षिकी विशेषांक में मेरी एक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। ग़ज़ल तो पुरानी है पर ये ख़बर अच्छी लग रही है।

ग़ज़ल एक बार फिर -

कहने को तो वो मुझे अपनी निशानी दे गया
मुझ से लेकर मुझको ही मेरी कहानी दे गया

जिसको अपना मान कर रोएँ कोई पहलू नहीं
कहने को सारा जहां दामन ज़ुबानी दे गया

मेरे घर में उस बुढ़ापे के लिए कमरा नहीं
वो जो इस घर के लिए सारी जवानी दे गया

आदमी को आदमी से जब भी लड़ना था कभी
वो ख़ुदा के नाम का क़िस्सा बयानी दे गया

हमने तो कुछ यूँ सुना था उम्र है ये प्यार की
नफ़रतों का दौर ये कैसी जवानी दे गया

उस के जाने पर भला रोएँ कभी क्यों जो मुझे
ज़िंदगी भर के लिए यादें सुहानी दे गया

याद है कल ’दोस्त’ हम तो हँसते-हँसते सोये थे
कौन आकर ख़्वाब में आँखों में पानी दे गया

Sunday, October 25, 2009

ग़ज़ल- छोटी-छोटी सी ख़ुशियाँ हैं


बाबुल की कच्ची कलियाँ हैं
खुशियाँ रंगती फुलझड़ियाँ हैं

नई मिट्टी है मन सोंधा है
कटती-जुड़ती सी कड़ियाँ हैं

तेरा प्यार से गाल चिकुटना
छोटी-छोटी सी खुशियाँ हैं

बचपन के सपनों से अब तक
अम्मा की जगती अँखियाँ हैं

झकमक धूप जो आंगन खेले
थोड़े दिन की रंगरलियाँ हैं

रातों को तेरी यादों से
लुकछुप मिलती दो सखियाँ हैं

अब के इस मौसम में नन्हें
फूलों से महकी गलियाँ हैं

Tuesday, October 20, 2009

ग़ज़ल-मिलते ही मैं गले नहीं लगता

लोग मुझको कहें ख़राब तो क्या
मैं जो अच्छा हुआ जनाब तो क्या

कुछ नहीं मुश्त-ए-ख़ाक से बढ़ कर
आदमी का है ये रुआब तो क्या

उम्र गुज़री उन आँखों को पढ़ते
इक पहेली  है वो किताब तो क्या

मैं हूँ जुगनू अगर तो क्या कम हूँ
और कोई हैआफ़ताब तो क्या

ज़िंदगी ही लुटा दी जिस के लिये
आज माँगे वही हिसाब तो क्या

मिलते ही मैं गले नहीं लगता
फिर किसी को लगे ख़राब तो क्या

हम फ़ना हो गए मुहब्बत में
’दोस्त’ मरकर मिला सवाब तो क्या


(फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन)
(२१२२ १२१२ २२)

Tuesday, September 01, 2009

ग़ज़ल- है फ़ासले तो बहुत पर मिली हैं राहें कहीं तो


गुज़र गया वो ज़माना, पड़ी हैं यादें कहीं तो
दबी हुई है कहानी, हैं दफ़्न लाशें कहीं तो

मैं जो ज़मीं पे हूँ ज़र्रा, है आसमां उसकी मंज़िल
हैं फ़ासले तो बहुत पर, मिली हैं राहें कहीं तो

किया करूँ मैं दिनो-रात उसकी बातें सभी से
मेरी भी यादों से महके किसी की रातें कहीं तो

मैं हँस रहा हूँ हमेशा कमी नहीं है किसी की
कोई बताता तो होगा उसे ये बातें कहीं तो


बढ़ा के ग़म ढूँढते हैं कहाँ-कहाँ ’दोस्त’ अब हम
चलो उतारे ये सामां, किसी से बाँटें कहीं तो

( इस गज़ल को लिखते वक़्त ६ शेर बने। एक जो शेर और बना वो कुछ यूँ है)-

दिखा रहा था वोजैसे मुझे नहीं जानता है
उसे नहीं याद कोई सुनी हों बातें कहीं तो


(मफ़ाइलुन फ़ाइलातुन ) x 2

Tuesday, June 16, 2009

जो सब कुछ पाने बैठे हैं- ग़ज़ल


जाने क्या ठाने बैठे हैं
वो जो अदना से बैठे हैं

हमको अब जब होश नहीं वो
हद की बातें ले बैठे हैं

ख़ुद का इल्म नहीं है उनको
पर सब को जाने बैठे हैं

कुछ ऐसे हैं, चैन से उकता
के जो ग़म पाले बैठे हैं

जाने क्या कुछ खो दें अब वो
जो सब कुछ पाने बैठे हैं

भीगी इन पलकों पे जाने
कितने अफ़साने बैठे हैं

मेरी गज़लें जिक्र हैं उनका
लो! वो ये माने बैठे हैं

'दोस्त' अब उनको क्या परखें जो
ग़ैरों में जा के बैठे हैं

Wednesday, June 10, 2009

ग़ज़ल- बड़ी ऊँची हैं दीवारें


चलो खु़द को ज़माने से मिला दें अब
नया ये काम कर के ही दिखा दें अब

बड़ा अनजान लगता है शहर मेरा
बड़ी ऊँची है दीवारें, गिरा दें अब

हो दिल में आग पर लब पर तबस्सुम हो
उन्हें मिलने का ये फ़न भी सिखा दें अब

तुम्हें है चैन ना मुझको क़रार आये
रुका सैलाब इन आंखों से बहा दें अब

नुमाइश की हमें आदत नहीं पर हाँ
सिहर जाओ जो ज़ख्म अपने दिखा दें अब

बड़ी धुँधली सी बातें कह रही आँखें
चलो झीना ये पर्दा भी हटा दें अब

उन्हें अपने जो ग़म से हो ज़रा फ़ुर्सत
तो 'दोस्त' अपना भी दर्द उनको सुना दें अब
.
(बहरे हज़ज़ मुसद्दस सालिम)
मुफ़ाईलुन x३
ग़ज़ल पर इस बहर की अच्छी जानकारी के लिये- सुबीर जी के ब्लाग यहाँ जायें

Thursday, May 21, 2009

बदलाव -बस यूँ ही

बदलाव ज़िंदगी का एक तरीका है। तरीका ख़ुद-ब-ख़ुद उलझ जाने का और उलझ कर फिर खू़बसूरती से सुलझ जाने का। हर उलझाव के साथ खुलते हैं कुछ गिरह और हर सुलझाव ले आता है एक सवाल। जवाब के इंतज़ार में एक लंबे ख़ामोश पल के बाद पीछे दरवाज़ा बंद होता है। और फिर खुलता है एक नियम और हम बंध जाते हैं उस नये नियम में।

हाँ, ये भी ज़िंदगी का एक तरीका है...

जगजीत सिंह की आवाज़ का जादू...

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जीवन क्या है, चलता फिरता एक खिलौना है
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है

चलते चलते राह में यूँ ही रस्ता मुड़ जाता है
अनजाने में अनजाने से रिश्ता जुड़ जाता है
किसे पता है किस रस्ते में कब क्या होना है

बीत गया जो वो हर पल आगे क्यों चलता है
राख हुये अंगारे कब के फिर भी दिल जलता है
भूली बिसरी यादों को अश्कों से धोना है

जो जी चाहे वो मिल जाये कब ऐसा होता है
हर जीवन जीवन जीने का समझौता होता है
अब तक जो होता आया है वो ही होना है

रात अंधेरी भोर सुनहरी यही ज़माना है
हर चादर में सुख का ताना दुख का बाना है
आती सांस को पाना जाती साँस को खोना है

Thursday, May 14, 2009

उम्र बन के रह गई है - ग़ज़ल


आपकी आँखों में मुझ को मिल गई है ज़िंदगी
सहरा-ए-दिल में कोई बाक़ी रही ना तश्नगी

रात के बोसे का शम्मे पर असर कुछ यूँ हुआ
उम्र भर पीती रही रो-रो के उस की तीरगी

उससे मिलके एक तुम ही बस नहीं हैरां कोई
है गली-कूचा परेशां देख ऐसी सादगी

आजकल दिखने लगा है मुझको अपना अक़्स भी
आजकल क्या आइना भी कर रहा है दिल्लगी

झुक गया हूँ जब से उसके सजदे में ऐ ’दोस्त’ मैं
उम्र बन के रह गई है बस उसी की बंदगी
फ़ाइलातुन x3 फ़ाइलुन
(बहरे रमल मुसम्मन महज़ूफ़)

Wednesday, April 29, 2009

ऊपर जहां चलता रहा- ग़ज़ल




मुझसे है ये सारी दुनिया मान कर छलता रहा
मैं ज़मीं में दफ़्न था ऊपर जहां चलता रहा

बस मुकम्मल होने की उस चाह में ताउम्र यूँ

ख़्वाब इक मासूम सा कई टुकड़ों में पलता रहा



था नहीं कोई धुआँ और आग भी थी बुझ चुकी 
बेसबब फिर रात भर मैं आँख क्योँ मलता रहा



दुनिया की रस्मों में कुछ यूँ हो गई मस्रूफ़ियत
अपने मरने का भी मातम कब मना, टलता रहा



उसको अब मुझसे शिकायत है कि मैं कमज़ोर हूँ
’दोस्त’ जिसकी ख़्वाहिशों में उम्र भर ढलता रहा

फ़ाइलातुनx3 फ़ाइलुन
(बहरे रमल मुसम्मन महज़ूफ़)

Monday, April 20, 2009

महावीर जी को जन्मदिन की शुभकामनायें- उनकी दो ग़ज़लें


आज महावीर शर्मा जी का जन्मदिन है। ग़ज़ल लिखना सिखाने में वे मेरे गुरु रहे हैं। ज्ञान की पूरी पोथी इनके पास है मगर विनम्रता इनके आगे नतमस्तक होती है। महावीर जी से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है । महावीर जी, आपसे बस यूँ ही सारा जग रोशन होता रहे, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ-
आपकी दो ग़ज़लें यहाँ डाल रही हूँ।


पहली ग़ज़ल-


कुछ अधूरी हसरतें अश्के-रवाँ में बह गए

क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दते-ग़म सह गए


गुफ़तगू में फूल झड़ते थे किसी के होंठ से

याद उनकी ख़ार बन, दिल में चुभो के रह गए


जब मिले हम से कभी, इक अजनबी की ही तरह

पर निगाहों से मेरे दिल की कहानी कह गए



दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था

शीशा-ए-दिल तोड़ डाला, ये सितम भी सह गए


दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ

फ़ासले बढ़ते गए, नक़्शे-क़दम ही रह गए


ख़्वाब में दीदार हो जाता तेरी तस्वीर का

नींद अब आती नहीं, ख़्वाबी-महल भी ढह गए


दूसरी ग़ज़ल-


भूल कर ना भूल पाए, वो भुलाना याद है

पास आए, फिर बिछुड़ कर दूर जाना याद है


हाथ ज़ख़्मी हो गए, इक फूल पाने के लिए

प्यार से फिर फूल बालों में सजाना याद है


ग़म लिए दर्दे-शमां जलती रही बुझती रही

रौशनी के नाम पर दिल को जलाना याद है


सूने दिल में गूँजती थी, मद भरी मीठी सदा

धड़कनें जो गा रही थीं, वो तराना याद है


ज़िन्दगी भी छाँव में जलती रही यादें लिए

आग दिल की आँसुओं से ही बुझाना याद है


रह गया क्या देखना, बीते सुनहरे ख़्वाब को

होंठ में आँचल दबा कर मुसकुराना याद है


जब मिले मुझ से मगर इक अजनबी की ही तरह

अब उमीदे-पुरसिशे-ग़म को भुलाना याद है




Saturday, March 21, 2009

ग़ज़ल-तेरे सिवा

तुझे ज़रा तो चैन हो मेरे खयाल के सिवा
कहीं नज़र तो आये कोई और भी मेरे सिवा


तु आ के मेरी ज़िंदगी में देख ले है क्या नहीं
हँसी, खुशी, चहक, महक, सभी तो है तेरे सिवा


चलो गुज़र गई जो फिर ये शाम कल की ही तरह
नया तो कुछ हुआ नहीं कभी गुज़रने के सिवा


मुझे कहाँ किसी सहारे की उम्मीद थी मगर
हज़ार हाथ आये थे, बस एक हाथ के सिवा


तू रख ज़रा सा सब्र ’दोस्त’, कर गुमां भरम पे ये
जहां में उसके और कौन है भला तेरे सिवा


(मफ़ाइलुन x 4)
बहरे रज़ज़ मुसम्मन सालिम

Wednesday, March 18, 2009

ग़ज़ल-मुझे तू आज़मा के देख तो कभी



तुझे यकीं ये हो न हो, मैं दोस्त हूँ तेरा, हाँ सच
ऐ आइना मैं अजनबी सा लगता हूँ तो क्या, हाँ सच


मैं दुश्मनी निभाउंगा तो दोस्ती ही की तरह
मुझे तू आज़मा के देख तो कभी ज़रा, हाँ सच



वो रोशनी की बात करता होगा सबके सामने
मगर उसे भी खुद है अपने दाग़ का पता, हाँ सच



मुझे भी जीतना तो आता है मगर, यूँ हार कर
गु़रूर को तेरे मैं जीतते हूँ देखता, हाँ सच



मैं मंदिरों में उससे कम ही मिलने आता जाता हूँ
वो रोज़ मेरे घर में आ के मुझसे है मिला, हाँ सच



वो जाते जाते मुझको ढेरों ग़म तो दे गया मगर
अज़ीज़ है मुझे हरेक अश्क़ जो बहा, हां सच



मैं आज सुर्खियों मे हूँ तो ’दोस्त’ बस तेरे लिये,
तुझे नहीं पता जो कर्ज़ मुझपे है तेरा, हाँ सच