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Monday, August 22, 2016
Sunday, October 20, 2013
तुम्हारे संग कुछ पल चाहता हूँ
जानता हूँ जगत मुझसे दूर होगा
पर तुम्हारे संग कुछ पल चाहता हूँ।
कठिन होगी यात्रा, राहें कँटीली,
व्यंजनायें मिलेंगी चुभती नुकीली,
कौन समझेगा हमारी वेदना को
नहीं देखेगा जगत ये आँख गीली,
प्यार अपना हम दुलारेंगे अकेले
बस तुम्हारे साथ का बल चाहता हूँ।
स्वप्न देखूँ कब रहा अधिकार मेरा
रीतियों में था बँधा संसार मेरा,
आज मन जब खोलना पर चाहता है
गगन को उड़ना नहीं स्वीकार मेरा,
भर चुके अपनी उड़ानें अभी सब जब,
मैं स्वयं का इक नया कल चाहता हूँ।
सभी अपने भाग्य का लेखा निभाते,
किसे सच्चा या किसे दोषी बताते,
नियति का है खेल इसको कौन समझे,
द्वंद में ही उलझ कर रह गये नाते,
है भला अपराध क्यों जो साँझ बेला
में अगर विश्राम-आँचल चाहता हूँ ।
पर तुम्हारे संग कुछ पल चाहता हूँ।
कठिन होगी यात्रा, राहें कँटीली,
व्यंजनायें मिलेंगी चुभती नुकीली,
कौन समझेगा हमारी वेदना को
नहीं देखेगा जगत ये आँख गीली,
प्यार अपना हम दुलारेंगे अकेले
बस तुम्हारे साथ का बल चाहता हूँ।
स्वप्न देखूँ कब रहा अधिकार मेरा
रीतियों में था बँधा संसार मेरा,
आज मन जब खोलना पर चाहता है
गगन को उड़ना नहीं स्वीकार मेरा,
भर चुके अपनी उड़ानें अभी सब जब,
मैं स्वयं का इक नया कल चाहता हूँ।
सभी अपने भाग्य का लेखा निभाते,
किसे सच्चा या किसे दोषी बताते,
नियति का है खेल इसको कौन समझे,
द्वंद में ही उलझ कर रह गये नाते,
है भला अपराध क्यों जो साँझ बेला
में अगर विश्राम-आँचल चाहता हूँ ।
Sunday, June 16, 2013
ज़िंदगी की किताब
ज़िंदगी के खाते में
दो और दो का हिसाब,
कभी दस तो कभी शून्य..
हज़ार पलों का लंबा हिसाब...।
एक लंबी सी किताब...।
चंद उम्मीदें
कुछ टंगे सपने
दो आंसू
एक बंद मुस्कान
और उलझा सा अंत लिये
ख़त्म होने आती है।
और फिर पढ़े हुये पुराने पन्ने
बेरुख़ी के साथ
उड़ते हैं...
उन्हें फिर से पढने की कोशिश,
हर पन्ने को गिनने की कोशिश में
मुड़ जाते हैं सफ़्हे,
फट जाता है इधर-उधर
ठीक से नहीं पढ़ा जाता कुछ भी,
और रह जाता है एक मशहूर उपन्यास
दुनिया की दुकान की ताक पर
भूली कहानी बन जाने के लिये
एक दिन....।
दो और दो का हिसाब,
कभी दस तो कभी शून्य..
हज़ार पलों का लंबा हिसाब...।
एक लंबी सी किताब...।
चंद उम्मीदें
कुछ टंगे सपने
दो आंसू
एक बंद मुस्कान
और उलझा सा अंत लिये
ख़त्म होने आती है।
और फिर पढ़े हुये पुराने पन्ने
बेरुख़ी के साथ
उड़ते हैं...
उन्हें फिर से पढने की कोशिश,
हर पन्ने को गिनने की कोशिश में
मुड़ जाते हैं सफ़्हे,
फट जाता है इधर-उधर
ठीक से नहीं पढ़ा जाता कुछ भी,
और रह जाता है एक मशहूर उपन्यास
दुनिया की दुकान की ताक पर
भूली कहानी बन जाने के लिये
एक दिन....।
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