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Sunday, July 25, 2010

जगत में झूठी देखी प्रीत- गुरु पूर्णिमा पर





जगत में झूठी देखी प्रीत ।
 अपने ही सुखसों सब लागे, क्या दारा क्या मीत ॥

मेरो मेरो सभी कहत है, हित सों बाध्यो चीत ।
अंतकाल संगी नहिं कोऊ, यह अचरज की रीत ॥

मन मूरख अजहूँ नहिं समुझत, सिख दै हारयो नीत ।
नानक भव-जल-पार परै जो गावै प्रभु के गीत ॥

Sunday, June 13, 2010

उस मोड़ से शुरु करें ये ज़िंदगी- जगजीत सिंह

जिस मोड़ पर ठहरे हो, वहाँ से दो रास्ते हैं, एक लौट जाता है पीछे और एक ठहर जाता है। आगे नहीं जाता।  ठहर कर पीछे मत देखो, आगे देखोगे तो भी पीछे देखना होगा।  बस ठहरे रहो। हवा उड़ा ले जायेगी तो चले जाना, हवा के साथ। पर तब भी मत देखना पीछे।  वो तुम नहीं थे, हवा थी जो गई, तुम तो अभी भी ठहरे रहोगे, वहीं।  किसी का हाथ पकड़ कर नहीं, अपना हाथ पकड़ कर रहो, वो तुम्हारे साथ था तो वहीं होगा, अपने मोड़ पर ठहरा हुआ, पीछे वो भी नहीं देखता होगा, आगे भी नहीं, बस वहीं, जहाँ है। प्रेम विश्वास है, स्थिरता, और कुछ नहीं।  

आइये सुनें ये सुंदर गज़ल, जगजीत की आवाज़ में।

Wednesday, June 02, 2010

दो रवीन्द्र संगीत- प्रेम एशे छीलो/आमारो परानो जाहा चाये...

रवीन्द्र संगीत की शृंखला में आज, दो और गीत।  भावानुवाद करने की कोशिश की है। किसी त्रुटि के लिये अग्रिम क्षमा याचना के साथ।

प्रेम एशे छीलो नि:शब्दो चौरोने...



प्रेम आया था, नि:शब्द पांव से
तब स्वप्न लगा वो
नहीं दिया आसन
प्रेम आया था...

बिदाई ली जब उसने
आहट पा कर
गया था दौड़ कर
तब वो शब्द-काया विहीन
सुनसान रात में विलीन
दूर पथ पर ज्यों दीपशिखा
रक्तिम मरीचिका
प्रेम आया था..

बंग्ला  में
प्रेम एशे छीलो नि:शब्दो चौरोने

ताई स्वप्नो मोने होलो तारे
दीनी ताहारे आसन
प्रेम एशे छीलो

बीदाए नीलो जोबे
शब्द पेये
गेनू धेये
से तोखुनो शब्द काया बिहीन
निशीतो तीमीरे बीलीन
दूरो पौथे दीप्शिखा
रक्तिम मोरीचीका
प्रेम एशे छीलो

दूसरा गीत-

आमारो परानो जाहा चाये ...

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मेरा प्राण जो चाहता है
तुम बस वही हो, ओ प्रिय!
तुम्हारे सिवा इस जगत में
मेरा कोई नहीं और
कुछ नहीं है, प्रिय!

तुम अगर सुख न पाओ,
तो सुख के संधान में जाओ
मैंने तो तुम्हें पाया है
हृदय मध्य
और कुछ नहीं चाहिये, ओ प्रिय!

मैं तुम्हारे विरह में रहूँगी विलीन
तुममें ही करूँगी वास
दीर्घ दिवस, दीर्घ रजनी, दीर्घ बरस मास,
यदि किसी और से प्रेम करो
यदि और कभी न फिर सको
तब तुम जो चाहो, वही तुम्हें मिले
मैं जितने भी दुख पा लूँ, ओ प्रिय!

बंग्ला में

आमारो परानो जाहा चाये
तूमी ताई, तूमी ताई गो!
तोमा छाड़ा आर जोगोते मोरा केहो नाई
किछू नाई गो!

तूमी सुख जोदी नाही पाओ
जाओ सुखेरो संधाने जाओ
आमि तोमारे पेयेछि हृदयो माझे
आर कीछू नाहि चाई गो

आमी तोमारी बीरोहे रोइबो बिलिन
तोमाते कोरीबो वास
दीर्घो दीबौशो, दीर्घ रौजौनी, दीर्घो बरौशो माश
जोदी आरो कारे भालोबाशो जोदी आर फीरे नाही आशो
तोबे तूमि जाहा चाओ ताहा जैनो पाओ
आमि जोतो दूखो पाई गो!

Sunday, April 18, 2010

याद पिया की आये

याद पिया की आये, ये दुख सहा न जाये...

सबसे पहले the authentic - बड़े गुलाम अली खां की आवाज़ में ...ये दर्द और कहाँ...



और एक नया तरीक़ा, रीमिक्स? मगर असरदार है- वडाली बंधु की आवाज़- निराला



फिर सुनिये उभरती हुईं- कौशिकी चक्रवर्ती की आवाज़- अब इतना बस चुके हैं बड़े गुलाम अली खां साहब जैसे लगती है बस उन्हीं की हो कर रह गई है ये ठुमरी, किसी और की आवाज़ में सुनना कुछ अजीब सा ही लगता है।

Thursday, March 11, 2010

मिताली (मुखर्जी) सिंह- दो गज़लें


उन दिनों ख़ूब ग़ज़लें सुनती थी, ख़ाली वक़्त में। जगजीत सिंह की ग़ज़लें सबसे प्रिय थीं। मेरी उम्र रही होगी सोलह-सत्रह साल की।  इसी तरह मिताली मुखर्जी (मिताली सिंह) की गायी एक दो गज़लों ने दिल में ऐसी जगह बनाई थी, कि अब भी उन ग़ज़लों को सुन कर वे दिन याद आ जाते हैं। उनकी आवाज़ की दीवानी थी मैं। आज उनकी दो गज़लें सुन रही थी। वे दिन भी कितने हसीन थे। :-)

अहमद फ़राज़ की ये गज़ल उनकी आवाज़ में-



कुछ प्यार जहां में ऐसे हैं
अश्कों में जो पलते देखे हैं
दुश्मन तो न बदले अपने कभी
हमदम ही बदलते देखे हैं

कुछ न किसी से बोलेंगे
तन्हाई में रो लेंगे

हम बेरहबरों का क्या
साथ किसी के हो लेंगे

ख़ुद तो हुए रुसवा लेकिन
तेरे भेद न खोलेंगे

नींद तो क्या आयेगी "फ़राज़"
मौत आई तो सो लेंगे

मिताली जी की ही गाई हुई एक और ग़ज़ल। शायरी तो ख़ास नहीं पर इस ग़ज़ल की कम्पोज़िशन में जादू था। जाने कितने हज़ार बार सुना होगा उसे तब-



मुझे माफ़ कर मेरे हमसफ़र तुझे चाहना मेरी भूल थी
किसी राह पर यूँ ही इक नज़र तुझे देखना मेरी भूल थी

तुझे देख के किसी हाल में, वो उलझना ज़ुल्फ़ों के जाल में
सुबहो-शाम तेरे ख़याल में, मेरा डूबना मेरी भूल थी

तुझे ढूँढती है मेरी नज़र न है रास्ता न कोई डगर
वो गली गली वो नगर नगर तुझे ढूँढना मेरी भूल थी

मेरे ख़्वाब भी हैं अजीब से, तुझे देख लूँ मैं क़रीब से
मुझे तू मिला है नसीब से, यही सोचना मेरी भूल थी।

Monday, January 25, 2010

मां-बाबा- आज तुम्हारे लिये- रवीन्द्र संगीत

एक पूरी ज़िंदगी के कुछ लम्हों को जी लेना ही कितना मुश्किल होता है, वहीं आज एक बहुत प्यारे जोड़े ने ऐसे कई सुनहरे लम्हों को साथ गुज़ारते हुये अपनी सुनहरी वर्षगांठ यानि कि अपने ५०वें साल में प्रवेश किया है- मेरे मां-बाबा।  आज २६ जनवरी को उनकी शादी की सालगिरह है। बचपन से ही मां को कभी भी कोई काम इन्डिपेन्डेन्ट्ली करते नहीं देखा है, बाबा ने मां का एक राजकुमारी की तरह ख़याल रखा है हमेशा। आज भी जब सुबह मां को फ़ोन किया, तो पता चला बाबा इस अवसर पर मां की पसंद की मिठाई लेने गये थे दुकान।

ये उनके शादी के (५० साल पहले)  अवसर पर छपी एक कविता-


आज इस अवसर पर, बचपन से उन दोनों की आवाज़ में जिस गाने को डुएट सुनती आई हूँ, उस रवीन्द्र संगीत को पेश कर रही हूँ-


तुमि रबे निरबे
हृदये मम...
इस गाने में हेमंत दा व लता जी की आवाज़- फ़िल्म कुहेली

Saturday, November 28, 2009

श्रीकांत आचार्य- आमार शाराटा दीन

बँगला गानों की शृंखला में, ये एक अत्यंत मधुर गीत आज, श्रीकांत आचार्य की आवाज़ में। मैंने इस गीत को पहली बार कुछ दिनों पहले ही, बंगाल से एक दोस्त के भेंट करने पर सुना।  इतना मधुर संगीत और मख़मली आवाज़ में इस गीत को सुन कर भाषा को जानने न जानने की ज़रूरत नहीं रह जाती है। फिर भी शब्द दे रही हूँ साथ में-



बंग्ला मे गीत- (नीचे हिन्दी में भावानुवाद)

आमार शारा टा दीन, मेघला आकाश बृष्टि तोमाके दीलाम
शुधु श्राबन संध्या टुकु तोमार थेके चेये निलाम

हृदयेर जानाला ए चोख मेले राखि
बाताशेर बांशी ते कान पेते थाकी
ताके ई काछे डेके
मोनेर आँगिना थेके
बृष्टि तोमाके तोबू फिरिये दिलाम

तोमार हाथ ए ई होक रात्रि रचना
ए आमार स्वप्न सूखेर भाबना
चेयेछि पेते जाके चाईना हाराते ताके
बृष्टि तोमाके ताई फिरे चाइलाम

हिन्दी में भावानुवाद-

मेरा सारा ये दिन, मेघमय आकाश, वृष्टि तुम्हें दे दी मैंने
बस श्रावन संध्या ही एक तुम से मांग ली है मैंने

हृदय की खिड़की पर आंखें बिछाये बैठा हूँ
हवा के बंसी पर कान लगाये बैठा हूँ
उसे ही पास बुला कर
मन के आंगन से
बृष्टि तुम्हें फिर भी लौटा रहा हूँ


तुम्हारे हाथों ही हो रात्रि रचना
यही मेरा स्वप्न है, सुख की भावना
जिसे पाना चाहा है, उसे चाहता नहीं खोना
वृष्टि तुम्हें इसलिये वापस मांगता हूँ

Thursday, November 12, 2009

भालोबाशो शुधु भालोबाशो- हेमंत कुमार


बचपन में इस गाने को सुनती थी, एल.पी. रेकार्ड पर। आज ये आनलाइन मिल गई। हेमंत कुमार द्वारा गाया ये बंग्ला गीत- भालोबाशो शुधु भालोबाशो। इसके रचनाकार कौन हैं नहीं जानती, पर शायद संगीत हेमंत कुमार का अपना हो, पक्का पता नहीं। इस गाने के मिठास के क्या कहने।



बंग्ला गीत (नीचे हिन्दी में भावानुवाद)


अनेक रात
झिमोनो चाँद
शब्द नेई
कथा कोयोना ना
भालोबाशो शुधू भालोबाशो

माझे-माझे
पाता देर
काना कानी
फिश-फिश
बहू दू्रे आकाशे ते
तारादेर म्जलिस
दूटी हृदय
स्वप्नमय
अनुभवे बाधा दियो ना

जूई बोने शिशिरे
आनागोना टूक-टूक
जोनाकी आर झाउ शाखार
लूकोचूरी चूप-चूप
दूटी चोखे जोतो कोथा
संकेते शोरे जेओ ना
भालोबाशो शुधू भालोबाशो

हिन्दी भावानुवाद 

गहरी रात
नशीला चांद
सन्नाटा
बातें न करो
प्रेम...बस प्रेम

कभी-कभी
पत्तों की
कानाफ़ूसी
फिस-फिस
बड़े दूर आकाश में
तारों की मजलिस
दो हृदय
स्वप्नमय
अनुभूति में
बाधा न बनो
प्रेम बस... प्रेम

जूही बन में
शिशिर के बीच
आनाजाना
टुक-टुक
जुगनु और
झाउ की डार
लुकाछिपी
चुप-छुप
दो आँखों में
जितनी बातें
इशारों से
दूर न जाओ
प्रेम...बस प्रेम

Saturday, October 17, 2009

जब दीप जले आना

दीपावली की सुंदर शाम, कई सुंदर पल, घर में लक्ष्मी के आगमन की तैयारी, मन में खुशियों के मेले, कई आने वाले सुंदर पलों की कल्पना और भगवान से प्रार्थना कि सब ऐसा ही सुंदर चलता रहे, सबके लिये। इन्हीं भावनाओं के साथ स्वागत है दीवाली तुम्हारा- २००९।

अभी यहाँ दीवाली शुरु नहीं हुई है, मगर दीवाली की उमंगें, दोस्तों से मिलना-जुलना शुरु हो चुका है। दीवाली की शाम आज कुछ अलग सी कटेगी, पं. रविशंकर के सितारवादन के साथ। बेसब्री से इंतज़ार है।

मेरा एक पसंदीदा गीत-

Sunday, September 27, 2009

डूब जायें बस...मुल्तानी काफ़ी- उस्ताद सलामत खां

मुल्तानी-काफ़ी राग सिन्धी भैरवी में उस्ताद सलामत खां की आवाज़ में - डूब जायें बस...

मुल्तानी काफ़ी एक तरह की गायकी है जिसमें सूफ़ी प्रभाव देखा जा सकता है। इसे सिन्ध और पंजाब में बहुत गाया जाता है। ये बहुधा पंजाबी या सिंधी भाषा में होती है। ये मुल्तानी काफ़ी ख्वाजा ग़ुलाम फ़रीद की लिखी हुई है।



Monday, August 17, 2009

यादें- क्या बात थी कि जो भी सुना अनसुना हुआ

पुरानी कई यादों को संजो कर ले आई हूँ इस बार भारत से। १८-१९ साल की उम्र में आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित मेरी गाई ग़ज़लें पापा के पुराने टेप-रिकार्डर में मिली। साथ ही मिला एक पुराना पीला अख़बार। पापा ने कितने जतन से ये सब संभाल के रखा है।

उन ग़ज़लों में से एक ग़ज़ल यहाँ सहेज रही हूँ।



और साथ ही वो अखबार की क्लिप।

Thursday, May 21, 2009

बदलाव -बस यूँ ही

बदलाव ज़िंदगी का एक तरीका है। तरीका ख़ुद-ब-ख़ुद उलझ जाने का और उलझ कर फिर खू़बसूरती से सुलझ जाने का। हर उलझाव के साथ खुलते हैं कुछ गिरह और हर सुलझाव ले आता है एक सवाल। जवाब के इंतज़ार में एक लंबे ख़ामोश पल के बाद पीछे दरवाज़ा बंद होता है। और फिर खुलता है एक नियम और हम बंध जाते हैं उस नये नियम में।

हाँ, ये भी ज़िंदगी का एक तरीका है...

जगजीत सिंह की आवाज़ का जादू...

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जीवन क्या है, चलता फिरता एक खिलौना है
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है

चलते चलते राह में यूँ ही रस्ता मुड़ जाता है
अनजाने में अनजाने से रिश्ता जुड़ जाता है
किसे पता है किस रस्ते में कब क्या होना है

बीत गया जो वो हर पल आगे क्यों चलता है
राख हुये अंगारे कब के फिर भी दिल जलता है
भूली बिसरी यादों को अश्कों से धोना है

जो जी चाहे वो मिल जाये कब ऐसा होता है
हर जीवन जीवन जीने का समझौता होता है
अब तक जो होता आया है वो ही होना है

रात अंधेरी भोर सुनहरी यही ज़माना है
हर चादर में सुख का ताना दुख का बाना है
आती सांस को पाना जाती साँस को खोना है

Saturday, May 09, 2009

रवीन्द्र जयंती पर- भालोबाशा भालोबाशा

आज रवीन्द्र जयंती पर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर का ये गीत प्रस्तुत है। (इसके भावार्थ की मैंने हिन्दी में अनुवाद की चेष्टा की है)।



यू-ट्यूब से मुझे एक विडियो भी मिला इस गाने का। फ़िल्म श्रीमान पृथ्वीराज-


हिन्दी में अनुवाद

सखी चिंता (भावना) किसे कहते हैं
सखी यातना किसे कहते हैं
तुम जो कहते हो दिन रात
प्रेम...प्रेम...
प्रेम क्या है
क्या ये सिर्फ़ पीड़ादायी है?
वो क्या केवल ही आँखों का पानी है
क्या वो केवल दुख का है श्वास
तब क्यों लोग सुख छोड़ कर
करते हैं ऐसे दुख की आस ?

मेरे आँखों में तो सभी सुंदर है
सभी नूतन है, सभी विमल
सुनील आकाश, श्यामल कानन
विशद ज्योत्सना, कुसुम कोमल
ये सभी मेरे जैसे केवल हँसते हैं
हँस खेल के मरने की इच्छा रखते हैं
न मैं वेदना जानती हूँ न ही रोना
न ही शौक़ की यातना कोई
फूल जैसे हँसते हँसते झर जाते हैं
जैसे ज्योत्सना भी हँस कर मिल जाती है
हँसते हँसते ही तारे भी आकाश से गिर जाते हैं

मेरे जैसा सुखी कौन है
आओ सखी आओ मेरे पास
मेरे सुखी हृदय के सुख गान सुन कर
तुम्हारे हृदय खिल उठेंगे
जो प्रतिदिन तुम रोती हो
एक दिन आओ और हँसो
एक दिन सब विषाद भुला कर आओ
सब मिल कर हम गायें
सखी....

बंग्ला में-
सखी भावना काहारे बौले
सखी यातना काहारे बौले
तोमरा जे बौलो दिबोशो रजनी
भालोबाशा भालोबाशा
सखी भालोबाशा कारे कहे
शे की केबल-ई जातनामय
लोके कोरे कि सुखेरि तोरे
अमोनो दुखेरो आस
आमारी चोखे तो सकल ही शोभोन
सकल ही नवीन
सकल ही बिमल
सुनील आकाश श्यामल कानन
विषद जोछोना कुसुम कोमोल
सकलई आमारी मोतो तारा केबली हाशे केबली हाये
हाशिया खेलिया मोरिते चाये
नाजानी बेदोन न जानी रोदन न जानी शादेर यातना जोतो
फूल से हाशिते हाशिते झोरे
जोछोना हाशिया मिलाये जाये
हाशिते हाशिते आलोक सागरे आकाशेर तारा तियाघिकाए
आमार मोतो सुखि के आछे आये सखी आये तोरा आमार काछे
सुखी हृदयेर सुखेर गान सुनिया तोदेर जोड़ाबे प्रान
प्रोतिदीन जोदि काँदीबी केबोल एक दिन आये हाशीबी तोरा
एक दिन आये बिषादो भूलिया
सोकोले मीलिया गाहिबो मोरा
भाबोना काहारे बोले सखि यातना काहारे बौले

Monday, April 13, 2009

मूसलाधार बारिश


कल की शाम बड़ी भारी थी
मूसलाधार बारिश में
कहीं बहुत कुछ भीग रहा था
हर पंखुडी़ पर जमा थी कई
पुराने उधडे़ लम्हों की दास्तां
एक छोटा सा लम्हा टपक पड़ा
किसी पंखुड़ी के कोने से
बडा सहेज कर रखा था
मैने उस लम्हें को
छितर गयी वो बूंद आज
कि उस बूंद के पीछे
बूंदों का सिलसिला जो चल पडा
एक रुका हुआ सैलाब
बाँध तोड कर टूट पडा
कि बहुत दिनो बाद बारिश हुई थी
मूसलाधार बारिश.... 


सुनिये- सावन बीतो जाये पिहरवा, मन मोरा घबराये...





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Friday, April 03, 2009

रामनवमी पर- सूरज की गर्मी से जलते हुये तन को

राम नवमी पर सुनते हैं ये प्रसिद्ध राम भजन -

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(जैसे) सूरज की गर्मी से जलते हुये तन को मिल जाये तरुवर की छाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है मैं जब से शरण तेरी आया

भटका हुआ मेरा मन था कोई मिल ना रहा था सहारा
लहरों से लड़ती हुई नाव को जैसे मिल ना रहा हो किनारा
इस लड़खड़ाती हुई नाव को जो किसी ने किनारा दिखाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है मैं जब से शरण तेरी आया
मेरे राम

शीतल बनी आग चंदन के जैसी राघव कृपा हो जो तेरी
उजियाली पूनम की हो जाये रातें जो थी अमावस अंधेरी
युग युग से प्यासी मरुभूमि ने जैसे सागर का संदेसा पाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है मैं जब से शरण तेरी आया
मेरे राम...

जिस राह की मंज़िल तेरा मिलन हो उस पर क़दम मैं बढ़ाऊँ
फूलों में ख़ारों में पतझड़ बहारों में मैं न कभी डगमगाऊँ
पानी के प्यासे को तक़दीर ने जैसे जी भर के अमृत पिलाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है मैं जब से शरण तेरी आया
मेरे राम...



Tuesday, March 10, 2009

सरर सरर


महावीर जी के ब्लाग पर होली के नाना रंग बिखरे हैं इस होली पर। वहाँ प्रकाशित है मेरा ये गीत, मगर फिर भी होली के इस अवसर पर एक बार फिर ये गीत यहाँ भी सुनिये-







सरर सरर सर मारी पिचकारी
ऐसा रंग डारा पी ने
मैं तन मन हारी

बइयाँ खींची मोरी
पकड़ी कलाई
गुलाल मले मुख पे जो
छूटी रुलाई
भीगी चोली और घाघर मोरी
खेलूँ कैसे मैं पी संग होरी

समझे न पी मोरी
इक भी बात
घर कैसे जाऊँ

रंग लै के साथ
जाने जग सारा मैंने लाज तो छोड़ी
पर कैसे खेलूँ मैं पी संग होरी



होली २००९ की बहुत बहुत शुभकामनायें।

Sunday, February 15, 2009

दो रवीन्द्र संगीत- (प्रेम)


आज दो रवीन्द्र संगीत पेश हैं- बहुत मधुर। इच्छा तो यही थी कि इनका हिन्दी में रूपांतरण करके लिखूँ, मगर ट्रांसलेट करते हुये लगा कि मैं इनके साथ न्याय नहीं कर पाऊँगी। अत: इन्हें ऐसे ही सुनें-

पहला मेरा सबसे प्रिय गीत-

मैंने तुम्हारे संग बाँधे हैं अपने प्राण सुरों के बंधन में
तुम जानो ना, मैंने पाया है तुम्हें कितने साधनों से

आमि तोमारो शौंगे बेंधेछि आमारो प्राण शूरेरो बाँधोने
तूमि जानोना आमि तोमारे पेयेछि अजाना शाधोने


दूसरा गीत

उस दिन दोनों झूमे थे बन में, फूलों के डोर में बंधे झूलना

शे दिन दू जोने दूले छिनु बोने फूलो डोरे बाँधा झूलोना

Saturday, January 03, 2009

संध्या मुखर्जी और उनके गीत


संध्या मुखर्जी, बंगाली फ़िल्मी संगीत में एक जाना माना नाम। उनकी सधी, मधुर आवाज़, उन दिनों जब कि कोई भी डिजिटल या कम्प्यूटर पर गाने रिकार्ड नहीं होते थे, बस असाधारण आवाज़।

उन्होंने अपनी संगीत की विधिवत शिक्षा पं संतोष कु. बासु, ए. कानन, चिन्मय लाहिड़ी से ली। उ. बड़े गु़लाम अली खां और उनके सुपुत्र मुनव्वर खां भी उनके गुरु रहे। उन्होंने हेमंत मुखर्जी के साथ बहुत सारे गाने गाये। उनकी आवाज़ सुचित्रा सेन पर बहुत ज़्यादा फ़िल्माई गई। हिन्दी फ़िल्मों में उनके द्वारा गाया हुआ ममता का गीत तोसे नैना लागे रे सांवरिया प्रसिद्ध हुआ।

आज सुनते हैं पहले एक हिन्दी गीत उनके द्वारा गाया ’आ गुपचुप गुपचुप प्यार करें’, फिर दो बंग्ला गीत संध्या मुखर्जी की ही आवाज़ में। बस मन मोह लेती है उनकी आवाज़।

(साभार- यू ट्यूब)

आ गुपचुप गुपचुप प्यार करें
फ़िल्म-सज़ा




आमी जे जलशा घरे
फ़िल्म- ऐन्टनी फ़िरंगी
फ़िल्माया गया- तनुजा पर



गाने मोर
फ़िल्म: अग्नि परीक्षा
फ़िल्माया गया- उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन पर