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Monday, January 25, 2010

मां-बाबा- आज तुम्हारे लिये- रवीन्द्र संगीत

एक पूरी ज़िंदगी के कुछ लम्हों को जी लेना ही कितना मुश्किल होता है, वहीं आज एक बहुत प्यारे जोड़े ने ऐसे कई सुनहरे लम्हों को साथ गुज़ारते हुये अपनी सुनहरी वर्षगांठ यानि कि अपने ५०वें साल में प्रवेश किया है- मेरे मां-बाबा।  आज २६ जनवरी को उनकी शादी की सालगिरह है। बचपन से ही मां को कभी भी कोई काम इन्डिपेन्डेन्ट्ली करते नहीं देखा है, बाबा ने मां का एक राजकुमारी की तरह ख़याल रखा है हमेशा। आज भी जब सुबह मां को फ़ोन किया, तो पता चला बाबा इस अवसर पर मां की पसंद की मिठाई लेने गये थे दुकान।

ये उनके शादी के (५० साल पहले)  अवसर पर छपी एक कविता-


आज इस अवसर पर, बचपन से उन दोनों की आवाज़ में जिस गाने को डुएट सुनती आई हूँ, उस रवीन्द्र संगीत को पेश कर रही हूँ-


तुमि रबे निरबे
हृदये मम...
इस गाने में हेमंत दा व लता जी की आवाज़- फ़िल्म कुहेली

Monday, August 31, 2009

ई-स्वामी - बधाई


कुछ दोस्त, कुछ रिश्ते यूँ ही राह में चलते-चलते बन जाते हैं। ई-स्वामी से कुछ ऐसे ही मुलाक़ात हुई थी आनलाइन। और राह में चलते-चलते कब हम दोनों इतने अच्छे मित्र बन गये, पता नहीं चला। कुछ एक जैसा ही बैक-ग्राउंड (मध्य प्रदेश से), कुछ एक जैसी सोच तो कुछ उल्टी सोच, कुछ दोनों का बेबाक (उसका मुँहफ़ट होना, मेरा बेबाक होना :-P) होना, कुछ मन का मेल...

ब्लॉग वर्ल्ड में अनाम रहने वाला ई-स्वामी अभी कुछ महीने पहले हमसे मिला। :-) एक टिपिकल देवर की तरह मेरे किचन में खूब मीन-मेख निकाले, कहा, भाभी, चाय तक बनानी नहीं आती, पता नहीं दादा कैसे झेलते हैं आपको। सो-कॉल्ड सही चाय बनानी सिखाई, और दादा के साथ गाड़ी और बीयर की बातें ले कर व्यस्त रहा। बिचारी भाभी सीन से गुल...(थोड़ा-बहुत एक अच्छे देवर की तरह दादा की डाँट से बचाया भी, मेरे सेल-फ़ोन स्कूल में छोड़ आने की बात उन्हें न बता कर, और फिर हर दो मिनट में धमकी दे कर- "बता दूँ?")।

आज ये पोस्ट एक ख़ास बात ऐलान करने के लिये कर रही हूँ- ई-स्वामी को कल दूसरे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है। परिवार वालों के बाद ये खबर सबसे पहले मुझे दी उसने (ऐसा कह्ता है वो, सच का पता नहीं)। बच्चे का नाम बच्चे के चाचा के छ: साल के बेटे ने विशिष्ट रखा है। मां और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं और ई-स्वामी बहुत खु़श। तुम्हें बहुत-बहुत बधाई ई-स्वामी।

Monday, August 17, 2009

यादें- क्या बात थी कि जो भी सुना अनसुना हुआ

पुरानी कई यादों को संजो कर ले आई हूँ इस बार भारत से। १८-१९ साल की उम्र में आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित मेरी गाई ग़ज़लें पापा के पुराने टेप-रिकार्डर में मिली। साथ ही मिला एक पुराना पीला अख़बार। पापा ने कितने जतन से ये सब संभाल के रखा है।

उन ग़ज़लों में से एक ग़ज़ल यहाँ सहेज रही हूँ।



और साथ ही वो अखबार की क्लिप।

Friday, May 29, 2009

फ़र्क़- भाग २

इस विषय पर पहले इस लिंक पर कुछ तस्वीरें पोस्ट की थीं। आज एक बार फिर फ़र्क़

समय-समय का फ़र्क़ के अंतर्गत ही-

अक्तूबर में- सर्दी के लिये तैयार होते पेड़- एक दोपहर
सर्दी में ठिठुरते पेड़- जनवरी की एक दोपहर
गर्मी के आगमन पर वही रास्ते- स्वागत में हरियाली से नहाये हुये से पेड़

Thursday, May 28, 2009

चूज़ों के जन्मने का जश्न

आज ६ चूजों ने जन्म लिया, मिस डान लोच की कक्षा में। बच्चे अतिउत्साहित थे। वे लगातार पिछले २१ दिन से हर अंडे को रोज़ ध्यान से देख रहे थे। हम भी सब जा-जाकर देख आते थे उन अंडों को। अभी कक्षा पहली के बच्चे लाइफ़-साइकल पढ़ रहे हैं,जिसके अंतर्गत बच्चों ने ये प्रोजेक्ट किया। इन्क्यूबेटर में ये अंडे २१ दिन तक रहे और जब ये चूज़े थोड़े बड़े हो जायेंगे तो इन्हें फ़ार्म में वापस दे दिया जायेगा, जहाँ से ये अंडे और इन्क्यूबेटर लाया गया है। फिर तो उन चूज़ों की नियति का पता है। वैसे बच्चों को बताया जाता है कि ये चू़ज़े अब वहाँ जा कर खेलेंगे, खुश रहेंगे, बड़े हो कर क्या होगा ये कोई पूछता नहीं न हम बताते हैं।







मिसेज़ बैटल की कक्षा पहली में एक पालतू गिनी पिग है। उसका नाम लूसी है और बच्चे बड़े प्यार से उसे खाना खिलाते हैं, देखभाल करते हैं। उसकी तस्वीर-



Wednesday, December 31, 2008

नायगरा सर्दी में

"ह्म्म...तो आप शापिंग करने गये थे उस पार। कितने का सामन लिया?"

" ६० डालर सर"

"अच्छा? सिर्फ़ साठ डालर का सामान लेने?....सीमा के पार? कब आये थे?"

" दोपहर के बाद, कोई ३ बजे"

" तो ४ घंटे के लिये...ह्म्म...क्या क्या खरीदा?"

" बस कुछ कपड़े लत्ते, कुछ कस्मेटिक्स"

" हार्ड कोर शापर्स...मगर...अच्छा कोई और सामान, ड्यूटिफ़्री से?"

"नहीं सर"

" ह्म्म...अरे! और ये जी.पी.एस. ? (’बच के जाओगे कहाँ, ये पकड़ा’ टाइप्स लहज़े में) ये कब लिया?"

"ये तो पुराना है, कोई एक साल"

" अच्छा? रिसीट है?"

"नहीं, रिसीट कैसे होगी, पुराना है"

" कोई बात नहीं, आगे जा कर बाईं तरफ़ रुक जाओ, वहाँ चेकिंग होगी, एक अन्य आफ़िसर चेक करेगा"

"ठीक, सर"
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" आप लोग उतर आयें गाड़ी से, मैं चेक करूँगा"

"जी"

" जी.पी.एस में ट्रैवल हिस्ट्री दिखा सकते हैं?"
"हाँ, ये लीजिये...५१ घंटे की ड्राइव, ३१०० कि.मी. की दूरी तय"

"ह्म्म, पुराना है, ठीक है...और कुछ नहीं खरीदा?"

"नहीं (उफ़! )"

"ठीक है, जाइये"
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कल घूमते हुये हम नायग्रा की तरफ़ गये, (हमारे घर से कोई २ से २.५ घंटे) वहाँ से सूझा कि बार्डर के उस पार अच्छे शापिंग माल हैं, देख आते हैं। तो सीमा पार कर उन माल्स में गये । कुछ थोड़ी सी खरीदारी की और आते वक़्त सीमा पर हुई पूछताछ का ब्यौरा ऊपर। छ: डालर की ड्यूटी लगनी थी, उन्होंने नहीं ली।
नायग्रा सर्दी में बर्फ़ बन जाता है। सर्दी में नायग्रा की तस्वीरें-
बर्फ़ से जमी नायग्रा नदी
विश्व के मशहूर दर्शनीय स्थलों में से एक

बर्फ़ के जमने से नदी के बीच टापू पर पेड़ आइस स्कल्पचर से लगते हैं

Sunday, November 30, 2008

उल्लास भी...(कुछ तस्वीरें)

कुछ रुकता नहीं...ज़िंदगी उतार चढ़ाव, दु:ख सुख के साथ चलती रहती है। क्रिसमस बस कुछ ही दिन दूर है, क्रिसमस की पार्टी, ख़रीदारी, उल्लास...ये भी ज़िंदगी का एक रूप है, बहुत सुंदर, मनभावन...
इस सप्ताहांत माल आदि में घूमते हुये कुछ तस्वीरें लीं। घर में क्रिसमस ट्री सजाना अगले सप्ताहांत का कार्यक्रम है। सुंदर माल सजने लगे हैं, सैंटा बाबा के साथ बच्चे तस्वीरें लेने आने लगे हैं, हर तरफ़ क्रिसमस कैरल गूँजने लगे हैं...जिंगल बेल जिंगल बेल...रुडाल्फ़ द रेड नोज़्ड रेनडियर...

कुछ तस्वीरें-

पाइंसेटिया के लाल पौधे हर तरफ़- क्रिसमस सज्जा का एक रिवाज़


माल के भीतर- हिरण, बर्फ़, जगमगाहट


क्रिसमस ट्री सज्जा


सजे धजे माल


सैंटा बाबा- हो हो हो




Thursday, November 20, 2008

कुछ तस्वीरें- इस मौसम की पहली बर्फ़

कल से ही शोर था रेडियो पर, बर्फ़ीला तूफ़ान आ रहा है। १० से.मी, स्नो की आशंका है। कल जल्दी निकल आना चाहती थी काम से, पर वही, ठीक बर्फ़ गिरनी शुरु हुई, तभी निकली। बर्फ़ रास्तों पर तब जमनी शुरु नहीं हुई थी। सारी रात बर्फ़ गिरी, और आज सुबह- ओह! कीचड़ से सने और फ़िसलते रास्ते। बस, ये तो अभी एक रिहर्सल है, आगे कई और इससे कहीं भयंकर बर्फ़ीली तूफ़ानें होंगी, प्रति मिनट एक रोड ऐक्सीडेंट की ख़बर होगी, रेडियो पर लगातार...नार्मल है वैसे ये सब, मौसम के नये नये रंग, ज़िंदगी जैसे ही...और सच...तभी तो ये ज़िंदगी है...


आइये देखें कुछ तस्वीरें-
फ़र्क़

बर्फ़ की सफ़ेदी ओढ़ने से पहले सिंदूर में रंगे से पत्ते, जो कुछ दिनों में ही झर गये
बर्फ़ के बाद आज इनका रूप

बर्फ़ में खेलते स्कूली बच्चे- मौसम का हर रंग सुंदर इनके लिये

Friday, October 03, 2008

फिर नया अनुभव

मेरी कक्षा का एक हिस्सा


पहला दिन था मेरा इस साल इन बच्चों के साथ। ८ साल और ९ साल के, कक्षा तीसरी और चौथी के। पिछले साल कक्षा ५,६,७ और आठवीं को पढ़ाने का काम मिला था। १२-१३ साल के बच्चे, बड़े हो चुके होते हैं इतने कि अपनी ज़िम्मेदारी समझने लगते हैं (प्राय: सभी)। इस साल अलग असाइन्मेंट है।

तो मेरा पहला दिन इन बच्चों के साथ। कक्षा में शोर सा, सब बैठे, पर थोड़ी देर बाद ही दो-चार उठ कर घूमते हुये दिखे, अचानक ही छितरे हुये। ह्म्म, ऐसा पिछले साल तो नहीं था। मिसेज़ सी, मिसेज़ सी की आवाज़ें कई बार बेवजह, कई बार पेन्सिल भूल जाने की शिकायतें। उनको मेरे कहानी पढ़ कर सुनाते वक्त, कई बार बीच में ही बोल उठते, अपनी किसी कहानी को इस कहानी में बिठाने की कोशिश करते (जो कि एक बहुत अच्छी रीडिंग स्ट्रैटिजी तो मानी जाती है, पर सही डिसिप्लीन नहीं)बच्चे...।

मैंने प्राइमरी (किन्डर्गार्टन से तीसरी तक) बच्चों को पढ़ाने का अलग से कोर्स ले रखा है फिर भी लगा बहुत फ़र्क़ है बड़े बच्चों को और छोटे बच्चों को पढ़ाने का। तो सबसे पहले तो कक्षा में नियम बनाने और उनको ढाँचा देने में कुछ और वक्त बिताया। मगर अगले दिन भी वही हाल। बार बार की हिदायतें दीं, बच्चों अब तुम छोटे बच्चे नहीं रहे, कक्षा दूसरी में नहीं हो और बात करने या कुछ कहने से पहले हाथ उठाना ज़रूरी है, टीचर के बोलने के बीच बोलना ’रूड’ कहलाता है, कक्षा के नियमों को चलो साथ दोहराते हैं... आदि। बच्चों के लिये क्लास में एक चार्ट बनाया, अच्छा काम किया अगर किसी बच्चे ने -जैसे कि किसी दूसरे बच्चे की मदद, या अपने मौक़े (टर्न) का हाथ उठा कर इंतज़ार करना, अपना काम समय पर करना, तो उन्हें तारे (स्टार) मिलते हैं। और कोई अगर अपना काम समय पर न करे, अपने साथियों से ’रूड’ हो, सबसे इज़्ज़त से बात न करे, आदि तो फिर नेगेटिव चिह्न मिलते हैं जिससे स्टार कैन्सल। हर तीन महीने के अंतर पर जो सबसे ज़्यादा स्टार पा सकेगा, वो किसी रिवार्ड का अधिकारी होगा।

बच्चे नये नियम, नये तरीके सीख रहे हैं। मैं भी सीख रही हूँ कि छोटे बच्चों को पढाना कोई असान काम नहीं , बहुत ज़्यादा धैर्य की ज़रूरत होती है। गुस्सा आये तो भी गुस्सा पी जाने की कला आनी चाहिये। वैसे भी बच्चे इतने प्यारे होते हैं कि क्या उन पर कोई गुस्सा करे। शिक्षक की ज़िंदगी में, (या किसी की भी वैसे तो) हर दिन एक नया अनुभव और सीखने वाला अनुभव होता है। इस साल फिर नया सीख रही हूँ। आशा है ये सीख आगे और भी काम आयेगी।

Friday, February 08, 2008

बर्फ़ बर्फ़ बर्फ़-फ़ील्ड ट्रिप

बच्चों को सुबह फ़ील्ड ट्रिप पर ले कर जाना था। वैसे तो बर्फ़ में बाहर निकलना कोई अच्छा नहीं लगता पर आज बेहद ही खूबसूरत दिन था। सूरज निकला हुआ था और हवा भी नहीं थी। सबसे अच्छे लग रहे थे चहकते हुये बच्चे। हम एक पार्क में गये जहाँ सिर्फ़ बर्फ़, बर्फ़ और बर्फ़ थी और बच्चों ने नाना तरह की गतिविधियों में भाग लिया। उनमें से एक था, बर्फ़ के घर बनाना (इगलू नहीं, क्विन्ज़ी कहते हैं उन्हें)। ये बर्फ़ के घर कुछ ऐसे ही बनते हैं जैसे हम बचपन में रेत की गुफ़ायें बनाया करते थे। पहले ज़मीन पर पडे बर्फ़ को साफ़ कर के उस पर फिर बर्फ़ डाल दिया जाता है। हमें बताया गया कि इस तरह ज़मीन की गरमाहट से नर्म झुरझुरी बर्फ़ सख्त हो जाती है और क्विन्ज़ी बनाना आसान होता है। फिर उसके दक्षिण दिशा में बर्फ़ को खोद कर अंदर जाने के लिये जगह बनाई जाती है। कहते हैं कि दक्षिण दिशा में दरवाज़ा हो तो घर को सूरज की गर्माहट मिलती है। इस बर्फ़ की गुफ़ा के अंदर का तापमान बाहर के तापमान से ५० डिग्री फ़रहन्हाइट ज़्यादा होता है। अक्सर, बर्फ़ीले तूफ़ानों में फँसे लोग ऐसी गुफ़ायें बना कर अपनी जान बचाते हैं। लीजिये इस फ़ील्ड ट्रिप से कुछ तस्वीरें-
सुंदर दिन
बर्फ़ में खेलते बच्चे

बर्फ़ खोदता बच्चा

बर्फ़ की गुफ़ा

Thursday, February 07, 2008

बर्फ़ बर्फ़ बर्फ़



" एन्वायरमेंट कनाडा का कहना है कि शुक्रवार को ३० से.मी. बर्फ़ गिरेगी, बर्फ़ खतरा जारी किया गया है" आदि आदि। दो दिन से यही खबर आ रही थी रेडियो पर, टी. वी पर हर जगह। और सब त
ो ठीक है बस मुश्किल ये है कि उस दिन शुक्रवार है, अर्थात स्कूल खुले होंगे। हाँ, उस दिन बच्चों के लिये स्कूल बंद है, 'प्रोफ़ेशनल डेवलपमेन्ट डे' है| अर्थात टीचरों की हाज़िरी ज़रूरी है। एक दिन पहले स्कूल में नोटिस ज़ारी हुआ था कि रेडियो टी.वी. ध्यान से सुनें। अगर स्कूल बंद होने की खबर हो तो स्कूल न आये कोई। बस हम सब ने प्रार्थनायें की कि स्कूल बंद हो जायें। इस बर्फ़ में न जाना पड़े। भगवान अपने ज़िद पर अड़े रहे, किसी की न सुनी और सुबह उठ कर एक घंटे टीवी के सामने बैठ कर आशाओं पर हर मिनट बाल्टी भर भर कर पानी फिरता देखा। पता चला कि बर्फ़ तो गिरेगी मगर स्कूल बंद नहीं होने वाले। मैं स्कूल जाने की तैयारी करने लगी। पति ने कहा," आज टैक्सी ले लेना, इस बर्फ़ में गाड़ी मत ले जाना"। टैक्सी कंपनी को फ़ोन किया तो पता चला कि किसी वक्त का वादा नहीं कर सकती आज टैक्सी कंपनियाँ। जब भी मैं तैयार हो जाऊँ, तब ही फोन करूँ। खैर, पति के आदेश का उल्लंघन करने की ठानी, और तैयार होने लगी। पति आफ़िस के लिये रवाना हो चुके थे। उनके लिये आसान है, बस से, ट्रेन से इस मौसम में जाना उतना मुश्किल नहीं होता। मैं निकलने ही वाली थी कि दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। कुछ दिनों से मेरी मुँहबोली बहन मेरे घर पर ही रह रही थी। यहीं से अपने काम पर आ-जा रही थी (वही, बर्फ़ आदि के चलते...उसका आफ़िस मेरे घर से पास है, उसके खुद के घर से)। वो अंदर आई और कहा," मेरे पीछे से किसी ने मेरी कार को क्रैश किया, कार डैमेज नहीं हुई है ज़्यादा, पर मैं वापस आ गई, इट इज़ नाट वर्थ गोइंग टु वर्क टुडे"। मैंने अपने मनोबल को संभाला और कहा, " ह्म्म्म, मैं निकलती हूँ।" उसने कहा,"दीदी मेरी बात सुनो, मत जाओ आज, इट इज़ नाट वर्थ" । दो चार बार ये कहने पर मैंने आखिर फ़ोन कर ही दिया स्कूल। आज बर्फ़ के चलते नहीं आ पाउंगी। स्कूल से बताया गया, नियमानुसार ऐसी हालत में मुझे सबसे पास के स्कूल में हाज़िरी देनी होगी, वरना तन्ख़्वाह कटेगी। सोचा कई बार, कि सबसे पास के स्कूल के लिये निकलूँगी तो अपने ही स्कूल न चली जाउँगी। तो खैर, मैने दिल पर पत्थर रख कर कहा, मैं नहीं आ पाउँगी। घर में बैठ कर पकौड़े खाये, टीवी देखी और अफ़सोस भी करती रही, कि चली जाती स्कूल तो भी शायद उतना बुरा नहीं था, आज ज़रूरी मीटिंग भी थी। बाद में पता चला कि स्कूल की आधी छुट्टी कर दी गयी थी और स्कूल बोर्ड ने बुरे मौसम के चलते तनख़्वाह काटने की नीति को नहीं अपनाया।

अगले दिन सब साफ़ था और मैंने राहत की साँस ली कि चलो, अब कुछ दिन तो बर्फ़ नहीं गिरनी चाहिये, १५ दिन का आराम शायद। रविवार रात को फिर टी.वी. पर १० से.मी. बर्फ़ की खबर थी। बस??? १० से.मी. ओह, कुछ भी नहीं। और बुधवार को फिर ३०-४० से.मी. बर्फ़ की खबर, इस बार भी कोई हल्ला नहीं, हम सभी काम पर गये, बर्फ़ में गाडियाँ भी चलीं और किसी ने कोई शिकायत भी नहीं की। मौसम के शुरु में काम के दिन पहली भारी बर्फ़ पर बड़े बड़े किस्से बने, मगर बाद के बदतर मौसम में भी सब सामन्य थे। इंसान की फ़ितरत ही ऐसी होती है। हर चीज़ की आदत हो जाती है। आज फिर भारी बर्फ़ गिरी है। कल बच्चों को लेकर टोबागनिंग, स्कींग आदि के लिये फ़ील्ड ट्रिप ले जा रही हूँ। बर्फ़ न हो तो मज़ा किरकिरा हो जायेगा। सब खुश हैं कि आज जम कर बर्फ़ गिरी है।




दूसरी छवि: सौजन्य: www.570news.com/shows/jeffallan.jsp

Friday, September 14, 2007

पड़ाव-२- अम्स्टर्डाम

हमारे टूर गाईड का नाम था मनीष। बहुत ही मिलनसार और अच्छे स्वभाव वाला। उसके साथ टूर पर कभी कभी लगता कि हम सब फिर अपने बचपन में पहुँच गये हैं। किसी टीचर के साथ फ़ील्ड ट्रिप पर हों जैसे। बस में जाते हुये हमें आने वाले मंज़िल की पूरी जानकारी के साथ साथ, कहाँ क्या मिलेगा, कहाँ हमें जेबकतरों से सावधान रहना चाहिये से लेकर कहाँ सबसे अच्छी आइसक्रीम मिलती है तक की ख़बर वो हमें देता था। १२ साल से इसी पेशे में रहने की वजह से शायद टूरिस्ट के मनोविज्ञान से वो भली भाँति परिचित था। इस टूर पर हम सब छोटे-बड़े मिलाकर ३७ लोग थे। हमें यहाँ हमारे पड़ोसी भी मिले...मतलब ये कि हमारे पास के शहर में, हमारे घर से २० मिनट की दूरी पर रहने वाले एक दम्पत्ति, जो कि इसी सैर के लिये आये हुये थे। दुनिया कितनी छोटी है सच!

ब्रसल्स से हम पहुँचे आइंडहोवन। सारी दोपहर के सफ़र के बाद प्राय: शाम हो चुकी थी जब हम अपने होटल पहुँचे। बहुत सुंदर होटल, और सबसे अच्छी बात, खाना भारतीय। मेरा तो वैसे भी भारतीय खाने के बग़ैर गुज़ारा नहीं होता। भारत से खानसामा आये हुये थे हमारे लिये, जिन्होंने खाना बनाया था। शाकाहारी, माँसाहारी, सभी तरह के व्यंजन थे..वाह!

मनीष साहब ने हमें हमारे अगले दिन का कार्यक्रम बता दिया था। सुबह ६ बजे उठो, ७ बजे नाश्ता, और ८ बजे अगले पड़ाव की ओर रवाना। वापस रात को इसी होटल में बसेरा। अगले दिन सुबह बस में चढ़ कर सभी सो गये। रोज़ ही ऐसा होता था। होटल से किसी मंज़िल की ओर सुबह जाते हुये २ से ३ घंटे का सफ़र होता था, जब हम सभी सोया करते थे। हम पहुँचे अम्स्टर्डाम शहर। सबसे पहले हम गये वहाँ की हीरे की फ़ैक्ट्री देखने। छोटे-बड़े, सुंदर, रंगीन, जाने कितने तरह के हीरे। कारीगर काम करते हुये हीरों पर। और आखि़र में हीरे की ख़रीदारी। इस टूर के बाद अब हीरे ख़रीदने के पैसे कहाँ थे। खै़र... (दुखी मन मेरे...)

हमें शहर का क्रूज़ करवाया गया, एक नौका पर। कनाल के दोनों तरफ़ थे हाउस्बोट जहाँ लोग रहते हैं और ये हाउस्बोट बहुत महँगे होते है। रहने वालों को उस के आसपास की ज़मीं भी ख़रीदनी पड़ती है। आम्स्टर्डाम को साइकिल सवारों की राजधानी कहा जाता है। बहुत सुंदर और स्वच्छ शहर।



हालैंड के लकड़ी के जूते बहुत प्रसिद्ध हैं। तो हम गये अब लकड़ी के जूतों की फ़
ैक्ट्री में। वहाँ लकड़ी के जूते बनते हुये देखे। आज भी शादी के समय रिवाज़ अनुसार जोडों को लकड़ी के जूते दिये जाते हैं, दूल्हा-दुल्हन के नाम खुदवा कर। लड़की के जूते लाल होते हैं और लड़कों के पीले।

जूतों की फ़ैक्ट्री से हम गये दोपहर का खाना खाने, शहर के बीच खुले एक भारतीय रेस्तराँ में। यही बात सबसे अच्छी है एस.ओ.टी.सी. के टूर की...रोज़ भारतीय खाना...क्या कहने। खाना खा कर, हम पहुँचे वोलेन्डाम, जो कि अम्स्टर्डाम की एक मछुआरों की बस्ती है। यहाँ साफ़ दिखाई देता है कि किस तरह समुद्र की सतह ज़मीन की सतह से ऊँची है। रास्ते में हमने पुरानी विंड मिल भी देखी, तस्वीरे खींची और दो घंटे के क़रीब वोलन्डाम में शांति से बिताने के बाद हम गये विश्वविख्यात मड्यूरोडाम में।

मड्यूरोडाम है एक बौना शहर यानि कि इस शहर में पूरे अम्स्टर्डाम को बौना कर के दिखाया गया है। विंडमिल, कथिड्रल, एयरपोर्ट आदि सभी बौनाकार। अपने आप में एक अनोखा देश। काफ़ी समय यहाँ बिता कर, हम वापस पहुँचे अपने उस रात के बसेरे में, थक कर चूर। पहुँचते पहुँचते शाम ढल चुकी थी। अम्स्टर्डाम की यादों को दिल में बसाये, अगले दिन एक नये पड़ाव की ओर निकलने की मानसिक तैयारी में लग गये हम, एक और सुबह के इंतज़ार में, कुछ नये याद संजोने, ब़ड़ी बेसब्री से...

Wednesday, August 22, 2007

यूरोप की सैर- पहला पड़ाव- ब्रसल्स

गर्मी की छुट्टियाँ शुरु हुईं और खत्म भी होने लगीं। दो महीने की छुट्टी में एक मही्ना तो कोर्स करने में चला गया। अगस्त में यूरोप के कुछ देशों की सैर को निकल पड़े हम। एस.ओ.टी.सी., जो कि एक भारतीय टूर कंपनी है, विदेश में रह रहे भारतीयों के लिये भी सैर का प्रबंध करती है। सैर या टूर शुरु हो रहा था लंडन से पर हम ने उसे ब्रसल्स से लिया। यानि कि हमारा पहला पड़ाव था ब्रसल्स, बेल्जियम की राजधानी। यूरोप में अपनी चीज़ें सम्हाल के रखने की लोगों की हिदायतें हमें कंठस्थ हो चुकी थीं। ज़रा सा चूके नहीं कि सामान ग़ायब। जैसा सुना था वैसा बुरा अनुभव रहा नहीं वैसे।

ब्रसल्स, एक सुंदर छोटा सा यूरोपीय शहर। मेरे सास-ससुर हमें आकर यहीं मिले और हम ने एक साथ अपनी यात्रा शुरु की। ब्रसल्स में लोगों का व्यवहार कुछ रूखा ही लगा। यहाँ (कनाडा में) रास्ते में चलते हुये भी लोगों को देख कर मुस्कराने की जैसे आदत सी हो गयी है, मगर ब्रसल्स में हमारा अनुभव कुछ बहुत अच्छा नहीं रहा। ख़ैर, टूर के पहुँचने के एक दिन पहले ही हम पहुँच गये थे तो ब्रसल्स को अपनी तरह से एक्सप्लोर करने का मौक़ा हमें मिला। ब्रसल्स बेल्जियम की राजधानी है और यहाँ फ़्रेन्च और फ़्लेमिश बोली जाती है। यहाँ हर जगह से लोग आ कर बसे है और इसलिये आपको रास्ते में हर तरह के लोग दिखेंगे। पुराना शहर है ब्रसल्स। यहाँ घूमने आ रहे लोगों को अगर फ़्रेंच न आती हो तो काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। यहाँ अंग्रेज़ी बहुत कम समझते हैं लोग।

कुछ तस्वीरें यहाँ के दर्शनीय स्थानों की-








यहाँ का प्रसिद्ध ग्रैंड प्लेस, ब्रसल्स के मध्यकाल का मार्केट स्क्वैर में स्थित, सिटी हाल के सामने।












ऐटोमियम- हेसेल पार्क में बनाया गया १९५८ के विश्व मेले के दौरान लोहे के अणु को १५० करोड़ बार बड़ा कर के दिखाया गया है। इसमें आप अंदर जा कर सबसे ऊपर की मंज़िल (गोलाकार) पर जा सकते हैं और पूरा ब्रसल्स शहर देख सकते हैं।






अगला पड़ाव- अम्सटर्डाम

Sunday, February 18, 2007

शाम - एक नज़ारा

कल शाम अचानक
एक भँवर सा उठा
बहुत देर तक
तेज़ हवा के साथ
उड़ती रही चिन्दियाँ
गोल गोल, आकार लेकर
एक बन
और थोड़ी देर बाद
झिझकते सूरज जैसे
वो भँवर भी उसके संग
धूमिल हो गया
और फिर शांत... अचानक सबकुछ
बिल्कुल शांत।
मगर वो चिंदियाँ, अभी भी
बिखरी पड़ी हैं,
यहाँ वहाँ

Wednesday, October 04, 2006

गाँव का मेला

बचपन में मीनाबज़ार जाया करते थे हम। उस बड़े वाले झूले पर झूलना और वहाँ पापकार्न और काटन कैंडी(बुढिया के बाल कहते थे शायद उसे) खाने का अलग मज़ा था। अभी पिछले सप्ताह सुना कि यहाँ भी ऐसा ही एक मेला लगा है। शहर से बहुत दूर कंट्रीसाइड में लगा हुआ है ये मेला। हर साल इसी वक्त लगता है। तो पिछले सप्ताहांत को वहाँ हो आये। बचपन के दिनों की यादें ताज़ा हो गयीं। यहाँ गाय, बछड़े, भेड़, बकरियाँ भी मेले का हिस्सा थीं। इन सब की प्रदर्शनी लगी थी। ताज़े फल और सब्ज़ियों की खरीद-फ़रोख़्त भी हो रही थी। मगर वहीं काटन कैंडी और पापकार्न और वही बड़ा वाला झूला और वही पैसे दे कर बंदूक से गुब्बारा फोड़ कर पुरस्कार पाना, सब कुछ एक जैसा। एक मिनट के लिये लगा कि अपने बचपन में फिर पहुँच गये हैं हम। कुछ तस्वीरें -

मेले में इस झूले के बग़ैर काम कैसे चले
















मेले में बछड़े की देखभाल करती लड़की















पुतला बना नाचता आदमी















ग़ुब्बारे फोड़ कर जीतो खिलौने















१९२० साल का एक विंड मिल






Sunday, July 30, 2006

अलविदा सुंदर वादियाँ

वैंक्यूवर की सुंदर वादियाँ छोड़ जाने का वक्त आ गया है। एक साल गुज़र गया। इस जगह को यादों में बसाये ज़िन्दगी के एक और मुक़ाम की ओर बढ़ रही हूँ...

इस फूलों के शहर से कुछ तस्वीरें--


बुचर्ट बगीचा, विक्टोरिआ
शहरों को जोड़ते मनोरम पहाड़ी ऊँचे-नीचे रास्ते

यहाँ के आदिवासियों की निराली कला, टोटम पोल


सुंदर वादियाँ, एक दृश्य

नाव से राजधानी विक्टोरिआ जाने की राह में

संसद भवन, विक्टोरिआ